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क्या आप ऐसे वीडियो देखते हैं। सावधान रहें, ये खबर पढ़े



लंदन। आजकल के जमाने में सोशल मीडिया पर हमें कई हैरतअंगेज वीडियो देखने को मिलते हैं। कोई शख्स ऐसा कारनामा कर रहा होता है या कोई ऐसा घटनाक्रम कैमरे में कैद होता है, जिसे देखकर हर कोई आश्चर्य में पड़ जाए। नई दुनिया ऑनलाइन की एक खबर के मुताबिक इनमें से कई वीडियो फर्जी होते हैं और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से बनाए गए होते हैं। इसलिए इन वीडियो पर तत्काल भरोसा नहीं किया जाना चाहिए। ऐसे आर्टिफिशियल वीडियो के लिए डीपफेक वीडियो नाम दिया गया है और कहा जा रहा है कि ये वीडियो फेक न्यूज जितने ही खतरनाक हैं। कई ऐप्स सहज उपलब्ध हैं, जिनसे इस तरह के वीडियो बनाए जा सकते हैं।

क्या-क्या हो सकता है ऐसे वीडियो में
- आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से किसी भी तरह के फर्जी वीडियो बनाए जा सकते हैं। आवाज के साथ मिक्सिंग कर किसी नेता या हस्ती से कुछ भी कहलवाया जा सकता है।
- पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा का ऐसा ही एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमे वे वह बात कहते नजर आ रहे थे, जो वास्तव में उन्होंने कभी कही ही नहीं।
- फोटो-वीडियो से तो पहले भी छेड़छाड़ होती रही है, लेकिन नई तकनीक के तहत कई टूल्स ऐसे हैं, जिन्होंने इस काम को बेहद आसान बना दिया है।
- कहा जा रहा है कि प्रियंका चोपड़ा का डीपफेक वीडियो बनाया जा चुका है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की आवाज से छेड़छाड़ कर वीडियो बनाया गया है।

फेक न्यूज यानी फर्जी खबरों को रोकने के स्मृति ईरानी के फैसले को भले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बदला दिया हो, लेकिन यह सच है कि मनगढंत खबरों के इस फेर में पूरी दुनिया उलझी है।
फेक न्यूज अकेले भारत की समस्या नहीं है। अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव के दौरान फेसबुक पर फेक न्यूज जारी होने का मामला सामने आया था। इस खबर में हम आपको फेक न्यूज से जुड़ी कुछ अहम जानकारी देंगे -
- फर्जी खबरों का इतिहास बहुत पुराना है। विश्व युद्धों के दौरान कौन जीता- कौन हारा इसकी मनगढंत खबरें फैलाई जाती थीं।
- 19वीं सदी की सबसे बड़ी फेक न्यूज अमेरिकी अखबार 'द न्यूयॉर्क सन' ने छापी थी। अखबार ने लिखा था कि दो अंतरिक्ष यात्री चंद्रमा पर गए हैं और उन्हें वहां जीवन मिला है। तब अखबार की खूब चर्चा हुई, लेकिन एक महीने बाद तब बड़ी किरकिरी हुई जब अखबार को खुद ही अपने पाठकों को बताना पड़ा कि यह सीरीज मनगढंत खबरों पर आधारित थी।
- 21वीं सदी में इंटरनेट का चलन बढऩे के साथ ही फर्जी खबरों की बाढ़ आ गई। ज्यादा से ज्यादा क्लिक हासिल करने के लिए सनसनीखेज और झूठी हैडिंग बनाई जाने लगीं।
- अमेरिका में यह फेक न्यूज इंडस्ट्री तेजी से फैली है। यहां जस्टिन कोलेर जैसे पत्रकार सामने आए, जिन्होंने फेक मीडिया संस्थान बनाकर विज्ञापनों के जरिए 18 लाख रुपए महीने तक कमाए। राष्ट्र
- पॉल हॉर्नर जैसे पत्रकार ने अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान खूब फर्जी खबरें लिखीं, जो न केवल गूगल न्यूज पर रैंक हुईं, बल्कि फेसबुक पर खूब पढ़ी गईं। हालांकि बाद में हॉर्नर को जेल भी जाना पड़ा।

- अमेरिका में फेक न्यूज का मामला कितना गरमा गया है, अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि राष्ट्रपति बनने के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने बकायदा उस मीडिया संस्थानों की लिस्ट जारी की थी, जिन्होंने चुनाव के दौरान उनके बारे में निराधार खबरें छापी थीं।
- अमेरिका से सबक लेते हुए अब यूरोप के कई देशों ने फेक न्यूज से लडऩे की तैयारी कर ली है। यहां फेक न्यूज की पहचान करने का सिस्टम बनाया जा रहा है।
- मलेशिया की संसद ने विरोध के बावजूद फेक न्यूज पर अधिकतम छह साल जेल की सजा वाला कानून पारित हो चुका है। आलोचकों ने इसे आम चुनाव से पहले विरोध को दबाने वाला कानून बताकर चिंता जताई है। शुरू में सराकर ने फेक न्यू्ज छापने पर अधिकतम 10 साल की सजा और पांच लाख रिंगिट यानी करीब 84.52 लाख रुपए के जुर्माने का प्रस्ताव था। आलोचना के बाद सरकार ने सजा को घटाकर छह साल कर दिया।
फेक खबरें तेजी से फैलती हैं। सामान्य खबरों की तुलना में इनकी हैडिंग की ओर आकर्षित होने वाले पाठकों की संख्या ज्यादा है। अकेले ट्वीटर की बात करें तो महज 0.1 फीसदी ट्विटर अकाउंट्स के जरिए 80 फीसदी फेक न्यूज को फैलाया जाता है।
फेक न्यूज के कारण सच्ची खबरों को खोज पाना मुश्किल होता है। इसके लिए कुछ वेबसाइट्स बनाई गई हैं, जहां पता लगाया जा सकता है कि कोई खबर झूठी है या सच्ची।

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