नौकरी करने वाले नहीं, रोजगार देने वाले बनें कृषि छात्र : कुलपति बिसेन
दीपक राय, भोपाल...
संस्कारधानी के नाम से मशहूर जबलपुर ने देश में एक बार फिर नाम रोशन किया है। देश के सभी कृषि विश्वविद्यालयों की रैंकिंग में जबलपुर स्थित जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय 12 स्थान पर है। विश्वविद्यालय द्वज्ञक्रा कृषि शिक्षा, कृषि अनुसंधान की दिशा में सराहनीय कार्य किये जा रहे हैं। कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्मय से कृषि प्रचार-प्रचार की दिशा में आगे बढ़ा जा रहा है। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. प्रदीप कुमार बिसेन ने दीपक राय से विस्तृत चर्चा की...
सवाल : कृषि शिक्षा हासिल करने वाले युवा भी खेती-बाड़ी नहीं करना चाहते? इसके लिए विश्वविद्यालय क्या कर रहा है?
डॉ. बिसेन : यह पूरे समाज के सामने बड़ी चुनौती है। हमारा देश कृषि प्रधान तो है, लेकिन नौजवान गांव में नहीं रहना चाहते, वे कृषि कार्य नहीं करना चाहते, उन्हें कृषि में ग्लैमरस बिजनेस नजर नहीं आता। हालाकि कृषि में बहुत से युवा अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं, लेकिन उनकी संख्या कम है। लोगों को कृषि कार्य ज्यादा जोखिम वाला दिखता है, युवाओं को लगता है कि सरकारी नौकरी में ज्यादा जोखिम नहीं है। वाइट कॉलर जॉब है, जबकि सच यह है कि एग्रीकल्चर का स्नातक नौकरी करने वाला नहीं, अपितु नौकरी देने वाला होता है, बस जरा सोच को सकारात्मक बनानी होगी। विश्वविद्यालय भी युवाओं को कृषि से जोड़ रहा है। सरकार द्वारा 2022 तक कृषि आय दोगुना करने की पहल की जा रही है यह निश्चित ही रंग लाएगी और कृषि आय बढऩे से युवा कृषि कार्यों की ओर अग्रसर होंगे। और कृषि की ओर आकर्षण बढ़ेगा।
सवाल : प्राकृतिक प्रकोप बढ़ रहा है, ऋतु परिवर्तन हो रहा है, ऐसे में किसान इस समस्या से कैसे निपटैं?
डॉ. बिसेन : किसानों को मोजेक प्रतिरोधक प्रजातियों का प्रयोग करना चाहिए। इससे उनकी फसल प्राकृतिक प्रकोपों से सुरक्षित रहेंगी। विश्वविद्यालय द्वारा कृषि विज्ञान केंद्र के फॉर्म में पिछले वर्ष सोयाबीन की बोअनी की गई थी। उस पर रोगों का असर अधिक नहीं हुआ क्योंकि हमने वहां पर रोग प्रतिरोध प्रजातियों को बोया था। हम किसानों के पास जा-जाकर यह जानकारी प्रदान करते हैं, लेकिन जागरुकता के आभाव में पूर्ण किसानों तक यह नहीं पहुंच पाती। इस वजह से फसल नुकसान होती है। किसानों को कृषि वैज्ञानिकों के संपर्क में लगातार रहना चाहिए ताकि उन्नत किस्म की फसलों की जानकारी प्राप्त कर सकें। ताकि वे नुकसान से बच सकें। खरीफ में धान लगाई जाती है, उसके बाद खेत खाली पड़ा रहा है, ऐसे में उसका रवि में प्रयोग में लाया जाये, जहां अपेक्षाकृत जल्दी गर्मी आ जाती है वहां पर तापरोधक फसल को बोना चाहिए ताकि गर्मी सहन करने वाली गेहूं बोई जा सकती है। कृषि विज्ञान केंद्र के माध्यम से ऐसी फसलें उपलब्ध भी कराई जाती हैं।
सवाल : पारंपरिक पौष्टिक फसलें, कोदो-कुटकी,रागी, ज्वार का उत्पादन खत्म हो रहा है, इसके संरक्षण के लिए क्या कर रहे हैं?
डॉ. बिसेन : कोदो-कुटकी,रागी, ज्वार की फसलों पर डिंडौरी में विश्वविद्यालय ने बहुत अच्छी परियोजनाएं संचालित की हैं। हमने कई प्रजातियां भी विकसित कीं। वर्तमान में यह परियोजना बंद कर दी गई है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने माइनर मिलेक्स नामक इस परियोजन को बंद कर दिया है। मेरी मध्य प्रदेश शासन से अपील है कि इस परियोजना को बंद नहीं किया जाना चाहिए। क्योंकि कोदो-कुटकी, रागी का सबसे अधिक क्षेत्रफल मध्य प्रदेश के पास में हैं। हम भी मध्य प्रदेश सरकार और भारत सरकार को इस परियोजना को पुन: प्रारंभ करने के लिए लिखेंगे।
सवाल : छात्र हित के लिये क्या योजना है?
डॉ. बिसेन : छात्रों का मूल्यांकन या रेटिंग छात्रों के हितार्थ उपलब्धियां कृषि शिक्षा में राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में, वैज्ञानिक चयन मंडल में हमारे ज्यादा से ज्यादा छात्र पहुंचे यह कोशिश कर रहे हैं। छात्र कल्याण के लिए अधिक से अधिक छात्रवृत्ति मिले उसके लिए कार्य करेंगे। ताकि राष्ट्रीय स्तर पर विश्वविद्यालय अपनी पहचान बना सके।
सवाल : रेसिड्यूल इफेक्ट लैब क्या है, इस पर विश्वविद्यालय कैसे कार्य कर रहा?
डॉ. बिसेन : राष्ट्रीय कृषि विकास परिजयोजना के तहत यह लैब बनाई जा रही है। इसकी राशि विश्वविद्यालय को उपलब्ध हो गई है। लैब के लिए बिल्डिंग बन गई है, आगामी छह महीनों में सारी मशीनरी लग जाएंगी और लैब कार्य करने लगेगी। इस लैब के माध्यम से रसायनिक खादों का मृदा के ऊपर, कृषि पर, मानवों पर पडऩे वाले दुष्प्रभावों का आंकलन हो पाएगा। पैदा की गई फसल में कई दिनों तक उपस्थित रहने वाले रसायनों की जांच भी इस प्रयोगशाला में की जाएगी। यह लैब पूरे प्रदेश में किसानों की फसलों की जांच कर पाएगी कि किस फसल में कितनी मात्रा में रसायनिक खाद का प्रयोग किया गया है।
सवाल : कृषि कर्मण अवार्ड पाने वाले मध्य प्रदेश में रसायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है, क्या यह चिंता का विषय नहीं है?
डॉ. बिसेन : मध्य प्रदेश सरकार ने जैविक नीति बनाई है। जैविक उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है। सरकार ने जैविक अनुसंधान केंद्र बनाने के लिए विश्वविद्यालय को जमीन आवंटित की है। हम यहां पर पूर्णत: जैविक रूप से फसल उत्पादन करके एक प्रादर्श प्रस्तुत करेंगे। मुख्यमंत्री ने विश्वविद्यालय प्रांगण में एक आदर्श प्रयोगशाला शुरू की है जिसमें जैविक खादों का उत्पादन कर रहे हैं। कीटों से फसलों को संरक्षित करने के लिए जैविक कीटनाशकों का निर्माण भी किया जा रहा है।
सवाल : किसानों तक डिजिटल रूप से कैसे पहुंचेंगे?
डॉ. बिसेन : विश्वविद्यालय ने इस दिशा में कदम बढ़ाते हुए एक अत्याधुनिक डिजिटल स्टूडियो का निर्माण किया है जिसका नाम कृषि ज्ञानवाणी किया है। विश्विद्यालय के कार्यक्षेत्र में आने वाले 25 जिलों के अंतर्गत 19 कृषि विज्ञान केंद्र हैं, इनके माध्यम से हम किसानों से दो-तरफा संवाद कायम किए हुए हैं। इसके साथ ही हम ऑडियो और वीडियो के माध्यम से भी हम किसानों से जुड़ेंगे। किसान मोबाइल संदेश भी प्रेषित किया जाता है। 12 लाख से ज्यादा किसानों से हम जुड़ चुके हैं। एक क्लिक में ही उन किसानों तक जानकारी प्रेषित कर दी जाती है। मंडला बालाघाट में हमने नया प्रयोग किया है। जिस किसान ने जो फसल लगाई है उसे वही जानकारी प्रदान की जाएगी।


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