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मौसम का सटीक पूर्वानुमान कृषि हेतु श्रेयस्कर- डॉं. विजया



  • जनेकृविवि में मौसम पूर्वानुमान पर 8 दिनी राष्ट्रीय प्रषिक्षण शुरू

दीपक राय, भोपाल...
जबलपुर। जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय स्थित कृषि अभियांत्रिकी महाविद्यालय सभागार में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद्, शुष्क कृषि केन्द्रीय अनुसंधान संस्थान हैदराबाद के सहयोग से ‘‘मौसम पूर्वानुमान के संचालन के लिए गतिशील फसल मौसम कैलेंडर के विकास हेतु चतुर्थ सेवा क्षमता निर्माण कार्यक्रम’’ (प्ट प्द.ैमतअपबम ब्ंचंबपजल ठनपसकपदह च्तवहतंउउम वद क्मअमसवचउमदज व िक्लदंउपब ब्तवच ॅमंजीमत ब्ंसमदकंत वित व्चमतंजपवदंसप्रपदह ॅमंजीमत थ्वतमबंेजपदह) विषय पर आयोजित 8 दिनी राष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यक्रम में राष्ट्रीय परियोजना समन्वयक डॉं. पी. विजया कुमार हैदराबाद ने मुख्य वक्ता के रूप में कहा कि मौसम पूर्वानुमान की सफलता हेतु राष्ट्रीयस्तर पर उपयुक्त फसल क्षेत्रवार फसलीय मौसम कैलेंडर का विकास कर किसानों को समय पर जानकारी देनी होगी ताकि जलवायु परिवर्तन से फसलों में होने वाले नुकसान से बचा जा सके। उन्होंने आगे कहा कि मौसम जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है क्योंकि यह हम सभी के दैनिक जीवन को प्रभावित करता है। अत्याधिक ठंडी हो या गर्मी हम असुविधा का अनुभव करते हैं, इसी तरह पौधे भी उनके आसपास होने वाली मौसमीय परिवर्तनों से प्रभावित होते हैं। कृषि की मौसम पर निर्भरता सर्वविदित है। यदि मौसम कृषि के लिए जरा भी प्रतिकूल हो जाये तो मेहनत व्यर्थ हो जाती है। मौसम की अनिश्चितता कृषि की मुख्य समस्या है जो कि अक्सर कृषि उत्पादन को प्रभावित करती है। इसलिये मौसम का सटीक पूर्वानुमान कृषि हेतु श्रेयस्कर सबित होगा।
संचालक अनुसंधान सेवाएं डॉं. धीरेन्द्र खरे ने मुख्य अतिथि की आसंदी से कहा कि भारत एक कृषि प्रधान देश है, जिसके परिणाम स्वरूप उसकी आर्थिक स्थिति कृषि आधारित है। कृषि उत्पादन की सफलता मौसम पर निर्भर रहती है। भारत जैसे देश में कभी सूखा, कभी अधित वर्षा तो कभी तापमान में अधिक असमान बदलाव कभी चक्रवात एवं तूफान के कारण फसल प्रभावित होती है। यह स्थिति पिछले दशक में ज्यादा देखने को मिली जिसे वैज्ञानिक जलवायु परिवर्तन में होने वाला प्रभाव को बता रहे है। कृषि का उत्पादन वर्षा के आगमन वर्षा के वितरण एवं वर्षा की समाप्ति पर निर्भर करता है। इसी प्रकार फसलें भी तापमान के कारण प्रभावित होती हैं। मौसम के विपरीत प्रभावों का फसलों के उत्पादन एवं उत्पादकता पर असर पड़ता है इसलिये आवश्यक है कि मौसम, जलवायु में होने वाले परिवर्तनों एवं इनके फसलों पर पड़ने वाले प्रभावों को अध्ययन किया जाये साथ ही कृषि एवं मौसम के अन्तरसंबंधों को समझा जाये जिससे कि फसलों पर मौसम के विपरीत प्रभावों को कम करके उत्पादकता को बढ़ाया जा सके।
अपने अध्यक्षीय उदबोधन में अधिष्ठाता कृषि संकाय डॉं. पी.के. मिश्रा ने कहा कि जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक क्रिया है जिसका मानवीय जनसंख्या एवं कृषि पर सीधा प्रभाव पड़ता है। मध्यप्रदेश की करीब 40 प्रतिशत खेती वर्षा पर आधरित है। वर्षा के आगमन, वितरण एवं समाप्ती का सीधा असर कृषि के उत्पादन पर पड़ता है। इसी प्रकार फसलों पर तापमान की कमी, अधिकता, पाला ओले पड़ना एवं बे-मौसम वर्षा भी कृषि उत्पादन को नुकसान पहॅंुचाती है।
पूर्व में अपने स्वागत भाषण में अधिष्ठाता डॉं. राजेन्द्र कुमार नेमा ने कहा वैश्विक तापमान में वृद्धि पिछले दशकों में हुई है और इसका असर खेती पर भी पड़ रहा है। इसलिये मौसम के पूर्वानुमान पर गहन अध्ययन और अनुसंधान की महती आवश्कता है। इस दौरान विभागाध्यक्ष
डॉं. गिरीश झा सहित भारत के विभिन्न राज्यों पश्चिम बंगाल, आध्रप्रदेश, जम्मू कश्मीर, तमिलनाडू, पंजाब, गुजरात महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश, झारखंड और राजस्थान के विशेषज्ञ, कृषि एवं मौसम वैज्ञानिक एवं शोधार्थी छात्रगण बड़ी संख्या में उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन डॉं. (श्रीमति) शीला पांडे एवं आभार प्रदर्शन परियोजना प्रभारी डॉं. मनीष भान ने किया। आयोजन की सफलता में विभागाध्यक्ष
डॉं. अतुल श्रीवास्त, डॉं. मोहन सिंह, डॉं. के.के. अग्रवाल, डॉं. पी.पी. सिह, डॉं. अभिजीत दुबे,
डॉं. दीपिका वर्मा, सुरेन्द्र, अनूप गिरी एवं आभास आदि का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
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