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गांधी के सिद्धांतों को जमीन पर उतारने वाले थे नाना जी

nanaji deshmukh chitrakoot


  • डिग्री नहीं, स्वरोजगार के स्वप्न लेकर निकलते हैं छात्र
  • राष्ट्र ऋषि नाना जी देशमुख की 101 वी जयंती मना रहा चित्रकूट
  • शोषित वर्गों की शिक्षा के लिए नाना जी की संकल्पना हुई साकार


चित्रकूट से दीपक राय...
चित्रकूट के घाट में भई संतन की भीर, तुलसी दास चंदन घिसै, तिलक देत रघुवीर। यह पंक्तियां तुलसीदास जी ने चित्रकूट में ही लिखी थीं। संत-महात्माओं से जुड़ी चित्रकूट की धरती की पवित्रता और ख्याति राम के आगमन से हुई थी। राम ने माता जानकी और लक्ष्मण जी के साथ वनवास के करीब साढ़े 11 साल यहीं गुजारे थे। प्रभु राम के दर्शन और कर्तव्यों के माध्यम से जीवन जीने का मार्ग दिखाने वाली गोस्वामी तुलसी दास द्वारा रचित रामचरित मानस का इतिहास भी इस क्षेत्र से जुड़ा है। आदिकवि महर्षि बाल्मीकि, जिन्होने प्रभू राम एवं उनके संपूर्ण जीवन एवं घटनाओं को रामायण में पहले ही लिपिबद्ध कर दिया था, का भी जुड़ाव इसी क्षेत्र में है।
पौराणिक एवं ऐतिहासिक रूप से समृद्ध चित्रकूट  विकास से लाखों कोसों दूर था। तभी 101 साल वर्ष पहले जन्मे चंडिकादास अमृतराव देशमुख ने चित्रकूट की धरती पर कदम रखते ही इसका उद्धार करने की ठान ली थी। इन्हें नानाजी देशमुख के नाम से जाना जाता है।   नाना जी पहले स्वप्नदृष्टा थे जिन्होंने चित्रकूट की तस्वीर बदलने की ठानी थी।  नाना जी द्वारा समाज के वंचित और शोषित वर्गों को शिक्षा से जोडऩे की वर्षों पहले हुई पहल आज उत्कृष्ट उदाहरण बनकर सामने आई है। तब रखी गई नींव आज भव्य इमारत का रूप धारण कर चुकी है। प्रसिद्ध समाजसेवी नाना जी देशमुख ने महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय की संकल्पना की थी। आज नानाजी की संकल्पना को दीनदयाल शोध संस्थान आगे बढ़ा रहा है। भारतीय तिथियों की दृष्टि से शरद पूर्णिमा को महाराष्ट्र प्रांत के ग्राम कडौली (हिंगोली) में नाना जी का जन्म हुआ था। अंग्रेजी केलेंडर के अनुसार  नाना जी 11 अक्टूबर 1916 को हुआ था। यह संयोग है कि वर्ष 2017 में शरद पूर्णिमा और 11 अक्टूबर एक सप्ताह के अंदर ही आये। नाना जी के दर्शन से प्रभावित चित्रकूट जन और संस्थाएं नाना जी के 101 वे जन्म दिन को पूरा सप्ताह (शरद पूर्णिमा, 5 अक्टूबर से 11 अक्टूबर 2017) मनाने के लिये उत्साहित हैं। 1991 में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री सुन्दर लाल पटवा ने ग्रामोदय विश्वविद्यालय की आधार शिला रखते हुये कहा था कि नाना जी के वैचारिक मंथन के बाद तैयार चंदन का तिलक उन्हीं को समर्पित करता हूं। पटवा जी ने कहा था मैं नाना जी को देश के प्रथम ग्रामीण विश्वविद्यालय का कुलाधिपति नियुक्त करता हूं। नाना जी के सामाजिक अनुभवों, नवाचारों और अभिप्रेरणाओं से आज चित्रकूट अभूतपूर्व विकास हुआ है। नाना जी का सीधा लगाव पूरे चित्रकूट क्षेत्र के आदिवासियों, ग्रामवासियों एवं वंचित,शोषित वर्ग से था। नाना जी कार्य आज भी जीवंत हैं। नाना जी की सोच थी कि ग्रामोदय संकल्पना के शाश्वत प्रेरणास्रोत महात्मा गांधी थे। इसके आधार पर ही विश्वविद्यालय का नाम महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय रखने का संकल्प लिया। जब विश्वविद्यालय स्थापित किया गया तब न इसका भवन था, न कोई बड़े भवन। चित्रकूट के संतों, महात्माओं, एवं स्वयंसेवी उदार व्यक्तियों ने मंदिर, मठ, धर्मशालाओं और रिहायशी कमरों को विश्वविद्यालय के लिए खोल दिये। देशभर के सेवानिवृत्त विद्वान प्रोफेसर सेवाभाव के साथ नाना जी के साथ जुड़े। प्रथम कुलपति के रूप में इंजीनियर प्रो. राजनारायण कपूर ने वैधानिक कारणों से मात्र एक रुपये वेतन लेकर कार्य शुरू किया। ग्रामोदय विश्वविद्यालय ने सरकारी सहायता न लेकर जन सहभागिता से स्थानीय संसाधन का बेहतर उपयोग करते हुये स्वावलंबन द्वारा अपने को प्रतिष्ठित किया। ना जी की इच्छा थी कि इस विश्वविद्यालय में पढऩे वाला छात्र केवल डिग्री लेकर नौकरी करने वाला युवा न बने बल्कि स्वयं रोजगार पैदा करने वाला हो।

नाना जी के विचारों को आगे बढ़ा रहे गौतम
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नाना जी ने ग्रामीण क्षेत्र को  शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वरोजगार का सूत्रपात किया था। ग्रामोदय विश्वविद्यालय के कुलपति नरेश चंद्र गौतम बताते हैं कि नाना जी का शिक्षा मॉडल आज दुनिया अपना रही है। नाना जी ने कौशल के माध्यम से रोजगार देने वाली शिक्षा प्रणाली शुरू की थी। कृषि को उद्योग से जोडऩे के लिए उन्होंने चित्रकूट ५०० गांव चुने, वहां पर ग्रामीण विकास का वातावारण बनाया। नाना जी द्वारा स्थापित विश्वविद्यालय में नाना जी की संकल्पना सेे प्रभावित महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. नरेशचन्द्र गौतम पूरी तरह से उनके प्रति समर्पित है तथा नाना जी के द्वारा व्यक्त किये गये विचारों के आधार पर ग्रामोदय विश्वविद्यालय को अंतरराष्ट्रीय शिक्षा जगत में पहचान दिलाने के लिए कार्य कर रहे हैं। प्रो. गौतम बताते हैं कि नाना जी की विचारों और प्रेरणाओं से ही मैं ग्रामोदय विश्वविद्यालय को आगे ले जा पा रहा हूं। विश्वविद्यालय को प्रथम बार में ही नैक द्वारा ए ग्रेड की मान्यता देना एक गौरव की बात है। विश्वविद्यालय परिसर में अनेक संकाय भवनों का निर्माण, शिक्षक कर्मचारी कल्याण की योजनाओं का क्रियान्वयन, गुणवत्ता पूर्ण पाठयक्रमों का संचालन तथा यू.जी.सी. द्वारा पाठयक्रमों को मान्यता आदि को अर्जित करना नाना जी के आशीर्वाद के फलस्वरूप ही हो पाया। गौतम बताते हैं कि ग्रामोदय विश्वविद्यालय को केन्द्र और राज्य सरकार का अपेक्षित सहयोग मिल रहा है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा मुख्यमंत्री सामुदायिक नेतृत्व क्षमता विकास कार्यक्रम के माध्यम से प्रदेश के युवाओं को सामाजिक नेतृत्व की शिक्षा देने का अभिनव कार्य संपादित कराया जा रहा है। गौतम बताते हैं कि चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय पूरे मध्य प्रदेश का पहला और एकमात्र ग्रामीण विश्वविद्यालय है। यहां पर वीडियो कांफ्रेंसिंग से पूरे मध्य प्रदेश में शिक्षा प्रदान की जा रही है। प्रदेश के हर जिले से बीएसडब्ल्यू (समाजसेवा में स्नातक) के लिए प्रतिवर्ष 40 छात्रों का चयन किया जाता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से प्रेरणा लेकर अक्टूबर माह में नाना जी देशमुख जैसे महापुरुष के व्यक्तित्व-कृतित्व पर चिन्तन कार्यक्रम प्रमुखता से संपन्न किया जा रहा है। महामहिम राज्यपाल एवं मध्यप्रदेश के विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति ओमप्रकाश कोहली ने 8 नवम्बर 2017 को चित्रकूट में विश्वविद्यालय परिसर में प्रबंध मण्डल की बैठक और दीक्षांत समारोह करने की अनुमति प्रदान कर दी है। नाना जी की इच्छा थी कि चित्रकूट में हीं ग्रामोदय विश्वविद्यालय की बैठक हो। ताकि प्रदेश सरकार के प्रमुख अधिकारी और महामहिम राज्यपाल स्वयं उपस्थित हों, ताकि चित्रकूट और ग्रामोदय विश्वविद्यालय का उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन हो तथा विकास का नवीन और अपेक्षित मार्ग प्रशस्त हो। कुलपति प्रो. गौतम ने बताया कि दीनदयाल शोध संस्थान का इस विश्वविद्यालय के विकास में पूरा सहयोग मिलता है।  कुलपति प्रो. नरेश चन्द्र गौतम कहते हैं कि अनेक अवसरों पर जब मुझे ग्राम्य भ्रमण एवं ग्राम्य प्रवास निरीक्षण हेतु जाना पड़ता है तो सभी लोग यही कहते है कि हमारे नाना जी के विश्वविद्यालय के आप कुलपति हैं, हमें आपसे पूरा लगाव है।

ग्रामीण विकास का मॉडल देखना है तो चित्रकूट आएं : अभय महाजन
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दीनदयाल शोध संस्थान के संगठन सचिव अभय महाजन बताते हैं कि  नाना जी के समर्पण और परिश्रम का परिणाम ग्रामोदय विश्वविद्यालय के रूप में प्रत्यक्ष रूप से देखा जा सकता है। वर्तमान समय में महाजन चित्रकूट के विकास के लिए दीन दयाल शोध संस्थान के माध्यम से बेहतर प्रयास कर रहे हैं। वे बताते हैं कि चित्रकूट की समस्त विकास संस्थाओं ने एकत्रित होकर अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का प्रथम एवं द्वितीय सामूहिक आयोजन ग्रामोदय विश्वविद्यालय परिसर में संपन्न हुआ। दीनदयाल शोध संस्थान के संगठन सचिव अभय महाजन बताते हैं कि नाना जी विकास पुरुष थे। चित्रकूट क्षेत्र में ग्रामीण विकास का कार्य एक मॉडल है। देश के अन्य हिस्सों में नाना जी ने विकास कार्य किये हैं। एकात्म मानव दर्शन के शिल्पकार नाना जी देशमुख का विकास दर्शन किसी धर्म, जाति, लिंग से भेद नहीं करता है। नाना जी की सदैव इच्छा रही है कि समाज के अंतिम और निचले व्यक्ति को विकास का पूरा लाभ मिले, यदि वह वंचित रहा ते समाज का ढॉंचा चरमरा जायेगा। सामाजिक परिवर्तन में विकास कार्यो की भूमिका विशिष्ट होती है, यह नाना जी के विचारों से स्वत: स्पष्ट होता है।

गांधी और जेपी को मन से स्वीकारने वाले थे नाना जी : वीरेंद्र व्यास 
DR. virendra kumar vyas associate professor chitrakoot

ग्रामोदय विश्वविद्यालय के सह प्राध्यापक डॉ. वीरेंद्र व्यास बताते हैं कि नानाजी देशमुख कि सोच थी 'मैं अपने लिए नहीं, अपनों के लिए हूं, अपने वे हैं जो पीडि़त और उपेक्षित हैंÓ। नाना जी ने विवाह नहीं किया लेकिन उन्हें देश में कहीं भी होटल, लॉज, धरमशाला या सर्किट हाउस में नहीं रुकना पड़ता था। सब जगह उनके परिवार हैं और उन्हीं में वे रहना पसंद करते थे। नानाजी का अपना घरोपा जेपी आंदोलन में हुआ। पटना में जब जेपी को लाठी लगी तो उसे पहले अपने पर लेने वाले नानाजी देशमुख ही थे। उस दिन जेपी के सभी फोटुओ में नानाजी कहीं न कहीं दिखते हैं क्योंकि वे जेपी को अकेला छोडऩे को तैयार ही नहीं थे। मोरारजी ने जनता पार्टी के तब के जनसंघ घटक में से जिन तीन लोगों को मंत्री बनाने का ऐलान किया उनमें एक नानाजी थे। 'चित्रकूट के घाट परÓ नामक लेख में  प्रभाष जोशी ने लिखा है कि नानाजी को उद्योग मंत्री होना था, लेकिन वे नहीं बने। देश की एक धारा के दो किनारों को जोडऩे वाले जेपी के एक पुल नानाजी देशमुख थे। जनता सरकार बनने के बाद सरकार के बजाय जेपी के साथ रहने वालों में नानाजी भी एक थे। फिर सालभर बाद राजनीति से संन्यास लेकर रचनात्मक कार्य में लगने की घोषणा की और उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में बैठ गए। वहां जयप्रभा ग्राम चल रहा है। दिल्ली में उन्होंने अपने मित्र दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर एक शोध संस्थान बनाया। जो देशभर में काम करता है। चित्रकूट में स्थापित ग्रामोदय विश्वविद्यालय भी गांधी के ग्राम स्वराज्य की कल्पना को साकार करने का प्रयोग है। चित्रकूट में ही रामनाथ गोयनका की याद में उन्होंने एक संस्थान खड़ा किया, जिसमें संचार के आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों और कठपुतली से लेकर लोकनृत्य जैसे पारंपरिक माध्यमों से जनसंचार और जनशिक्षण के प्रयोगों की जानकारी है।

 नाना जी का चित्रकूट मॉडल देखकर प्रेरणा लेना चाहिये : जय प्रकाश शुक्ला
jai prakash shukla PRO mgcgv chitrakoot


नाना जी के बारे में बताते हुए ग्रामोदय विश्वविद्यालय के जनसंपर्क अधिकारी जय प्रकाश शुक्ला बताते हैं कि  1977 में जब जनता पार्टी की सरकार बनी, तो उन्हें मोरारजी-मन्त्रिमण्डल में शामिल किया गया परन्तु उन्होंने यह कहकर कि 60 वर्ष से अधिक आयु के लोग सरकार से बाहर रहकर समाज सेवा का कार्य करें, मन्त्री-पद ठुकरा दिया। वे जीवन पर्यन्त दीनदयाल शोध संस्थान के अन्तर्गत चलने वाले विविध प्रकल्पों के विस्तार हेतु कार्य करते रहे। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने उन्हें राज्यसभा का सदस्य मनोनीत किया। अटलजी के कार्यकाल में ही भारत सरकार ने उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य व ग्रामीण स्वालम्बन के क्षेत्र में अनुकरणीय योगदान के लिये पद्म विभूषण भी प्रदान किया। शुक्ला बताते हैं कि चित्रकूट के विकास में सबसे बड़ी समस्या दो राज्यों की सीमा (उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश)थी। यहां की जनता सरकार से इस बात के लिये अनुरोध करती रही कि चित्रकूट क्षेत्र से राज्य सीमा का बंधन समाप्त कर दिया जाय क्योंकि प्रभु राम की कर्मभूमि, बनवास स्थली समग्र चित्रकूट क्षेत्र में आती है। राज्य सीमाओं के कारण चित्रकूट का विकास पूरी तरह से नहीं हो पा रहा था। नाना जी ने इस कृत्रिम समस्या को ठीक से समझा और निदान के रूप में स्वावलंबन को आधार बनाकर संयुक्त चित्रकूट के विकास को दृष्टिगत रखते हुये दोनो राज्यों की 50 कि.मी. की परिधि को अपना कार्य क्षेत्र बनाया, विकास की धारा में बाधक राज्य सीमा नाना जी के स्तर पर स्वत: सुलझ गई। नाना जी ने अपने जीवन काल में चित्रकूट क्षेत्र में अनेक प्रकल्प स्थापित किये, शासकीय एवं स्वैच्छिक संगठनों की योजनाओं को प्रभावी कराया। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम ने चित्रकूट क्षेत्र का भ्रमण कर विकास कार्यों को देखा और विकासकर्ताओं का आवाहन किया कि नाना जी का चित्रकूट मॉडल देखकर प्रेरणा लेना चाहिये। सर्वथा सत्य है कि चित्रकूट की हर विकास गतिविधि में नाना जी देशमुख का दर्शन और उनकी रचनात्मक भावना झलकती है। नाना जी ने कभी अपने लिये नहीं बल्कि अपनों के लिये किया है। नाना जी की प्रेरणा से चित्रकूट हीं नहीं देश-विदेश के अनेकों लोग विकास मॉडल को आत्मसात कर रचनात्मक कार्य कर रहे हैं। भावपूर्ण शब्दों में कहे कि नाना जी हम सबके थे।
चित्रकूट क्षेत्र बुंदेलखंड के पिछड़े इलाकों में शामिल है। इस दृष्टि से यहां के बच्चों को पढऩे के लिए ग्रामोदय विश्वविद्यालय ने खुला मौका दिया है। बहुत ही मामूली शुल्क में विश्वविद्यालय द्वारा रहने व खाने की सुविधा के साथ शिक्षा प्रदान की जा रही है। नानाजी का मानना था कि जब अपने वनवासकाल के प्रवास के दौरान भगवान राम चित्रकूट में आदिवासियों तथा दलितों के उत्थान का कार्य कर सकते हैं, तो वे क्यों नहीं। अत: नानाजी चित्रकूट में ही जब पहली बार 1989 में आए तो यहीं बस गए और गांवों की तस्वीर बदल डाली। प्रख्यात समाजसेवी नानाजी देशमुख का जन्म महाराष्ट्र के परभणी जिले में 11 अक्टूबर सन् 1916 को एक ब्राम्हण परिवार में हुआ था। बाल्यकाल से किशोरावस्था के रथ पर सवार होने तक उनके मन में भारत के गांवों की दुर्दशा की चिंता अपना आशियाना बना चुकी थी, जिसको लेकर नानाजी प्राय: फिक्रमन्द रहने लगे। चूंकि नानाजी का बचपन काफी अभावों में बीता था, इसलिए उनके अंदर दबे पिछड़े गरीब लोगों के प्रति दया का सागर हिलोरें मारता। 1960 में लगभग 60 वर्ष की उम्र में नानाजी ने राजनीतिक जीवन से सन्यास लेते हुए सामाजिक जीवन में पदार्पण किया। वे आश्रमों में रहकर सामाजिक कार्य (खासतौर पर गाँवों में) करते रहे परन्तु कभी अपना प्रचार नहीं किया। नानाजी ने दीनदयाल उपाध्याय के निधन के बाद शोकग्रस्त न होते हुए दीनदयाल के दर्शन एकात्म मानववाद को साकार किया तथा दिल्ली में खुद के दम पर दीनदयाल शोध संस्थान की स्थापना की। चित्रकूट के जंगलों में पाई जाने वाली जड़ीबूटियों की उपयोगिता जन जन तक पहुंचाने के लिए नानाजी द्वारा आरोग्यधाम की स्थापना की गई जहां विभिन आयुर्वेदिक चिकित्सा व् औषधियों का निर्माण होता है। 27 फरवरी  सन् 2010 को नाना जी का देहांत हो गया। तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम भी नानाजी की समाजसेवा के कायल थे। नानाजी ने अपने मृत शरीर को मेडिकल शोध हेतु दान करने का वसीयतनामा निधन से काफी पहले 1997 में ही लिखकर दे दिया था। निधन के बाद नानाजी का शव अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान को सौंप दिया गया।

nanaji deshmukh


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