नानाजी ने बदल डाली तस्वीर, चित्रकूट के लिए वरदान है ग्रामोदय : जय प्रकाश शुक्ला
चित्रकूट... नाना जी के बारे में बताते हुए ग्रामोदय विश्वविद्यालय के जनसंपर्क अधिकारी जय प्रकाश शुक्ला बताते हैं कि चित्रकूट क्षेत्र बुंदेलखंड के पिछड़े इलाकों में शामिल है। इस दृष्टि से यहां के बच्चों को पढऩे के लिए ग्रामोदय विश्वविद्यालय ने खुला मौका दिया है। बहुत ही मामूली शुल्क में विश्वविद्यालय द्वारा रहने व खाने की सुविधा के साथ शिक्षा प्रदान की जा रही है। नानाजी का मानना था कि जब अपने वनवासकाल के प्रवास के दौरान भगवान राम चित्रकूट में आदिवासियों तथा दलितों के उत्थान का कार्य कर सकते हैं, तो वे क्यों नहीं। अत: नानाजी चित्रकूट में ही जब पहली बार 1989 में आए तो यहीं बस गए और गांवों की तस्वीर बदल डाली। प्रख्यात समाजसेवी नानाजी देशमुख का जन्म महाराष्ट्र के परभणी जिले में 11 अक्टूबर सन् 1916 को एक ब्राम्हण परिवार में हुआ था। बाल्यकाल से किशोरावस्था के रथ पर सवार होने तक उनके मन में भारत के गांवों की दुर्दशा की चिंता अपना आशियाना बना चुकी थी, जिसको लेकर नानाजी प्राय: फिक्रमन्द रहने लगे। चूंकि नानाजी का बचपन काफी अभावों में बीता था, इसलिए उनके अंदर दबे पिछड़े गरीब लोगों के प्रति दया का सागर हिलोरें मारता। 1960 में लगभग 60 वर्ष की उम्र में नानाजी ने राजनीतिक जीवन से सन्यास लेते हुए सामाजिक जीवन में पदार्पण किया। वे आश्रमों में रहकर सामाजिक कार्य (खासतौर पर गाँवों में) करते रहे परन्तु कभी अपना प्रचार नहीं किया। नानाजी ने दीनदयाल उपाध्याय के निधन के बाद शोकग्रस्त न होते हुए दीनदयाल के दर्शन एकात्म मानववाद को साकार किया तथा दिल्ली में खुद के दम पर दीनदयाल शोध संस्थान की स्थापना की। चित्रकूट के जंगलों में पाई जाने वाली जड़ीबूटियों की उपयोगिता जन जन तक पहुंचाने के लिए नानाजी द्वारा आरोग्यधाम की स्थापना की गई जहां विभिन आयुर्वेदिक चिकित्सा व् औषधियों का निर्माण होता है। 27 फरवरी सन् 2010 को नाना जी का देहांत हो गया। तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम भी नानाजी की समाजसेवा के कायल थे। नानाजी ने अपने मृत शरीर को मेडिकल शोध हेतु दान करने का वसीयतनामा निधन से काफी पहले 1997 में ही लिखकर दे दिया था। निधन के बाद नानाजी का शव अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान को सौंप दिया गया।
1977 में जब जनता पार्टी की सरकार बनी, तो उन्हें मोरारजी-मन्त्रिमण्डल में शामिल किया गया परन्तु उन्होंने यह कहकर कि 60 वर्ष से अधिक आयु के लोग सरकार से बाहर रहकर समाज सेवा का कार्य करें, मन्त्री-पद ठुकरा दिया। वे जीवन पर्यन्त दीनदयाल शोध संस्थान के अन्तर्गत चलने वाले विविध प्रकल्पों के विस्तार हेतु कार्य करते रहे। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने उन्हें राज्यसभा का सदस्य मनोनीत किया। अटलजी के कार्यकाल में ही भारत सरकार ने उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य व ग्रामीण स्वालम्बन के क्षेत्र में अनुकरणीय योगदान के लिये पद्म विभूषण भी प्रदान किया। शुक्ला बताते हैं कि चित्रकूट के विकास में सबसे बड़ी समस्या दो राज्यों की सीमा (उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश)थी। यहां की जनता सरकार से इस बात के लिये अनुरोध करती रही कि चित्रकूट क्षेत्र से राज्य सीमा का बंधन समाप्त कर दिया जाय क्योंकि प्रभु राम की कर्मभूमि, बनवास स्थली समग्र चित्रकूट क्षेत्र में आती है। राज्य सीमाओं के कारण चित्रकूट का विकास पूरी तरह से नहीं हो पा रहा था। नाना जी ने इस कृत्रिम समस्या को ठीक से समझा और निदान के रूप में स्वावलंबन को आधार बनाकर संयुक्त चित्रकूट के विकास को दृष्टिगत रखते हुये दोनो राज्यों की 50 कि.मी. की परिधि को अपना कार्य क्षेत्र बनाया, विकास की धारा में बाधक राज्य सीमा नाना जी के स्तर पर स्वत: सुलझ गई। नाना जी ने अपने जीवन काल में चित्रकूट क्षेत्र में अनेक प्रकल्प स्थापित किये, शासकीय एवं स्वैच्छिक संगठनों की योजनाओं को प्रभावी कराया। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम ने चित्रकूट क्षेत्र का भ्रमण कर विकास कार्यों को देखा और विकासकर्ताओं का आवाहन किया कि नाना जी का चित्रकूट मॉडल देखकर प्रेरणा लेना चाहिये। सर्वथा सत्य है कि चित्रकूट की हर विकास गतिविधि में नाना जी देशमुख का दर्शन और उनकी रचनात्मक भावना झलकती है। नाना जी ने कभी अपने लिये नहीं बल्कि अपनों के लिये किया है। नाना जी की प्रेरणा से चित्रकूट हीं नहीं देश-विदेश के अनेकों लोग विकास मॉडल को आत्मसात कर रचनात्मक कार्य कर रहे हैं। भावपूर्ण शब्दों में कहे कि नाना जी हम सबके थे।

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