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माननीयों की मर्यादा क्यों हो रही खत्म?

92 घंटे माननीयों ने हंगामे में बर्बाद

parliament of india


दीपक राय।
भारतीय लोकतंत्र में संसद जनता की सर्वोच्च प्रतिनिधि संस्था है। इसी माध्यम से आम लोगों की संप्रभुता को अभिव्यक्ति मिलती है। संसद ही इस बात का प्रमाण है कि हमारी राजनीतिक व्यवस्था में जनता सबसे ऊपर है, जनमत सर्वोपरि है। यह वही संस्था हैं जहां पर जनता के द्वारा चुने गए सांसद पहुंचते हैं। जनता इन्हें इसलिए चुनती है ताकि वे संसद में जनहित के निर्णय लेकर विकास की गाड़ी को आगे बढ़ाएं, लेकिन सांसदों ने इस शीलकालीन सत्र की दिशा को ही बदल दिया। एक महीने चले संसद के शीतकालीन सत्र ने इस बार रिकॉर्ड कायम कर लिया। यह रिकॉर्ड अच्छाई के बजाय बदनुमा दाग बन गया। एक महीने के सत्र की 21 बैठकोंं में केवल 19 घंटे ही काम हुआ और 92 घंटे माननीयों ने हंगामे में बर्बाद कर दिया। उत्पादकता के लिहाज से यदि बात की जाए तो लोकसभा के पास कामकाज के लिए 111 घंटे उपलब्ध थे, 92 घंटे बर्बाद कर दिए गए। इसी तरह राज्यसभा में 108 घंटे कामकाज के लिए निर्धारित थे, लेकिन केवल 22 घंटे काम हुआ और 86 घंटे बर्बाद हुए. यानी कि काम के लिहाज से लोकसभा और राज्यसभा में क्रमश:15.75 प्रतिशत और राज्यसभा में महज 20.61 प्रतिशत ही काम हुआ। सत्र पूरी तरह से इस बार नोटबंदी की भेंट चढ़ गया। इसे देश का दुर्भाग्य की कहा जाएगा कि पिछले 15 वर्षों में इस शीत सत्र में सबसे ज्यादा हंगामा और सबसे कम काम हुआ। नोटबंदी के विरोध को लेकर समूचे विपक्ष तथा सत्ता पक्ष ने इतना हंगामा मचाया कि संसद की मर्यादा ही तार-तार हो गई। सरकार ने भी हंगामे को काबू करने के लिए कोई विशेष प्रयास नहीं किए।
इस बार सत्ता पक्ष ने भी विपक्ष के ऊपर आरोपों की बौछार कर विपक्ष को घेरने का प्रयास किया। जिसके कारण पूरे सत्र के दौरान सत्ता एवं विपक्ष दोनों उत्तेजित और  अपनी-अपनी हठ में अड़ा रहा।
विपक्ष लोकसभा और राज्यसभा के अंदर हंगामा मचाता और सदन के बाहर आकर मीडिया में बयान जारी करता। सबसे आश्चर्यजनक बात यह रही कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक रैली में कहा कि मुझे संसद में नहीं बोलने दिया जा रहा है। विपक्ष भी कहां पीछे रहता, राहुल गांधी ने भी एक कार्यक्रम में आरोप मढ़ दिए कि उन्हें भी संसद में बोलने नहीं दिया जा रहा है। राहुल ने तो यहां तक कह दिया कि वे बोलेंगे तो भूकंप आ जाएगा, तीसरे ही दिन राहुल ने प्रधानमंत्री पर आरोप मढ़ दिया कि मैं भ्रष्टाचार संबंधी पोल खोल दूंगा तो गुब्बारा फूट जाएगा। संसद का शीतकालीन सत्र 16 नंवबर 2016 से शुरू होकर 16  दिसंबर 2016 तक चला। 31 दिनों की अवधि में कुल 21 बैठकें होनी थीं। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के आंकड़ों के मुताबिक सत्र के दौरान, 10 विधेयक (सभी लोक सभा में) पुर-स्थापित किए गए। लोक सभा ने 4 विधेयक और राज्य सभा ने 1 विधेयक पारित किया।  एक विधेयक अर्थात, कराधान विधि (दूसरा संशोधन) विधेयक, 2016 संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित माना गया। दो और विधेयक अर्थात विनियोग (संख्या 4) विधेयक, 2016 और विनियोग (संख्या 5) विधेयक, 2016, जिस रूप में लोक सभा द्वारा पारित किए गए थे। राज्य सभा को उसकी सिफारिश के लिए भेजे गए थे, राज्य सभा में उनकी प्राप्ति की तारीख से चौदह दिनों की अवधि के भीतर उनके लोक सभा को लौटाए जाने की संभावना नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 109 के खंड (5) के अंतर्गत इन विधेयकों को उक्त अवधि की समाप्ति के पश्चात दिनांक 23.12.2016 को दोनों सदनों द्वारा उस रूप में पारित किया गया माना जाएगा जिस रूप में उन्हें लोक सभा द्वारा पारित किया गया था।  नि:शक्त व्यक्ति अधिकार विधेयक, 2016 को भी संसद के सदनों द्वारा पारित किया गया है। सत्र के दौरान पुर्नस्थापित किए गए, विचार और पारित किए गए विधेयकों के नामों की सूची परिशिष्ट के रूप में संलग्न है। बस इतने काम के अलावा संसद में सिर्फ हंगामा होता रहा। लोक सभा में नियम 193 के अंतर्गत सांसद ए.पी. जितेन्द्र रेड्डी द्वारा 'काले धन को समाप्त करने के लिए नोटों का विमुद्रीकरण' पर दिनांक 5 दिसंबर को चर्चा आरंभ की गई थी जो पूरी नहीं हो सकी। राज्य सभा में नियम 267 के अंतर्गत नोटिस के तहत 'विमुद्रीकरणÓ पर चर्चा हुई थी वह भी अधूरी रह गई। संसद में जो होता है उस पर आमजनता की नजर होती है। देश के साथ ही पूरी दुनिया इस पर नजर बनाए रखती है। हमारे माननीयों को यह आत्ममंथन करना बहुत जरूरी हो गया है कि वे जो कर रहे हैं क्या इससे समाज में उनकी स्वीकार्यता बढ़ेगी या वे जनता-जर्नादन के दिल से दूर होते जाएंगे? संसद एवं विधानसभा में हो-हल्ले के बीच बहुमत के आधार पर बिना गुण-दोष  पर चिंतन हुए बिना जो कानून बनते हैं उनसे फायदा कम, नुकसान ज्यादा होता है। नियमों एवं कानूनों में बार-बा होने वाले संसोधनों से विधायिका की साख भी कम हुई है। वहीं, मुकदमों की संख्या भी न्यायालयों में तेजी से बढ़ रही है। विधायिका को अपने उत्तरदायित्व को ठीक से समझना होगा
- (लेखक न्यूज एडिटर हैं और सोशल मीडिया राजनीति पर अध्ययन कर रहे हैं)

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