शारदा चिटफंड मामला: सीबीआई ने कई बार की थी पूछताछ की कोशिश लेकिन टालती रही ममता की पुलिस
खास बातें
बीते दिनों शारदा चिटफंड मामले में सीबीआई द्वारा की जा रही जांच को लेकर बंगाल सरकार और केंद्र सरकार के बीच तनातनी रही। कई दिनों तक चली राजनीतिक गहमागहमी के बाद सुप्रीम का आदेश आया। जिसके बाद मेघायल के शिलांग में सीबीआई ने कोलकाता पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार से पूछताछ की।
इस मामले में पश्चिम बंगाल पुलिस सीबीआई को सहयोग नहीं कर रही थी जबकि सीबीआई शारदा चिटफंड मामले में पूछताछ करना चाह रही थी।
कब शुरू हुआ विवाद?
ये विवाद उस वक्त शुरू हुआ जब सीबीआई के 5 सदस्यों को पश्चिम बंगाल पुलिस ने हिरासत में ले लिया। ये पांच सदस्य उन 40 लोगों की टीम का हिस्सा हैं जो कोलकाता के पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार से पूछताछ करने उनके घर गई थी। इन लोगों को ढाई घंटे तक थाने में रखने के बाद छोड़ा गया।
धरने पर बैठीं ममता
इसके बाद मुसीबत खत्म नहीं हुई बल्कि और बढ़ गई। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी धरने पर बैठ गईं। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार पुलिस कमिश्नर भी उनके साथ थे। कुछ घंटों में ही ये मामला संवैधानिक संकट का मुद्दा बन गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी राज्य के जलपाईगुड़ी में हुई अपनी रैली के दौरान विपक्षी पार्टी समेत ममता और उनकी पार्टी पर संवैधानिक संकट पैदा करने का आरोप लगाया था। वहीं दूसरी तरफ ममता बनर्जी, उनकी पार्टी और अन्य विपक्षी दलों का कहना था कि केंद्र सरकार सीबीआई का गलत तरीके से इस्तेमाल कर रही है।
क्या संवैधानिक संकट की स्थिति उत्पन्न हुई थी?
सबसे पहले संवैधानिक संकट क्या है ये जानते हैं। केंद्रीय जांच एजेंसी के अधिकारियों को हिरासत में लेना और केंद्रीय गृह मंत्री द्वारा राज्यपाल से गोपनीय रिपोर्ट मंगवाना संवैधानिक संकट के उदाहरण के तौर पर देखे जा सकते हैं। वहीं पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री का पुलिस अधिकारी के बचाव में उतरना और धरने पर बैठ जाना संघीय व्यवस्था की विफलता को दर्शाता है। ममता बनर्जी ने तो अधिकारियों को राज्य का उच्च सम्मान देने तक की बात कह दी थी। जिससे ये मामला और भी गंभीर हो गया था।
पश्चिम बंगाल में पैदा हुए संकट को संवैधानिक संकट कहा जा सकता है जो सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद कम हुआ। लेकिन अगर अनुच्छेद-356 को देखें तो इसे संवैधानिक व्यवस्था की विफलता नहीं कहा जा सकता। इसका मतलब ये कि राष्ट्रपति शासन लागू करने जैसी स्थिति नहीं मानी जा सकती।
पश्चिम बंगाल में पैदा हुए संकट को संवैधानिक संकट कहा जा सकता है जो सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद कम हुआ। लेकिन अगर अनुच्छेद-356 को देखें तो इसे संवैधानिक व्यवस्था की विफलता नहीं कहा जा सकता। इसका मतलब ये कि राष्ट्रपति शासन लागू करने जैसी स्थिति नहीं मानी जा सकती।
क्या सीबीआई के पास पूछताछ का अधिकार है?
सीबीआई को राज्यों ने अपने यहां जांच के अधिकार इसलिए दिए हुए हैं। सीबीआई दिल्ली पुलिस इस्टैब्लिशमेंट एक्ट-1946 के तहत काम करती है। लेकिन कई बार राज्य ये कहते हैं कि सीबीआई केंद्र सरकार की कठपुतली है। पश्चिम बंगाल में ही बीते साल सरकार ने आदेश जारी कर राज्य में जांच के लिए सीबीआई को दी गई सहमति और मान्यता रद्द कर दी थी।
जिसके बाद किसी भी मामले में सीबीआई को राज्य में जांच करने के लिए सरकार की अनुमति लेना जरूरी हो गया। लेकिन ये आदेश पुराने मामलों में लागू नहीं हो सकता। इसका मतलब ये हुआ कि शारदा चिटफंड मामले में भी ये आदेश लागू नहीं होता। यानी चिटफंड मामले में पुलिस कमिश्नर से पूछताछ या जांच के लिए सीबीआई को राज्य की अनुमति की आवश्यकता नहीं है।
इससे भी बड़ी बात ये है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर साल 2014 से सारदा और अन्य चिटफंड मामलों की जांच की जा रही है। इसके अलावा कोर्ट ने भी अपने कई आदेशों में राज्य सरकारों और राज्य पुलिस से सीबीआई को सहयोग देने को कहा है।
जिसके बाद किसी भी मामले में सीबीआई को राज्य में जांच करने के लिए सरकार की अनुमति लेना जरूरी हो गया। लेकिन ये आदेश पुराने मामलों में लागू नहीं हो सकता। इसका मतलब ये हुआ कि शारदा चिटफंड मामले में भी ये आदेश लागू नहीं होता। यानी चिटफंड मामले में पुलिस कमिश्नर से पूछताछ या जांच के लिए सीबीआई को राज्य की अनुमति की आवश्यकता नहीं है।
इससे भी बड़ी बात ये है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर साल 2014 से सारदा और अन्य चिटफंड मामलों की जांच की जा रही है। इसके अलावा कोर्ट ने भी अपने कई आदेशों में राज्य सरकारों और राज्य पुलिस से सीबीआई को सहयोग देने को कहा है।
सीबीआई को और कहां नहीं है अनुमति?
पश्चिम बंगाल से पहले सीबीआई पर बीते साल ही आंध्र प्रदेश सरकार ने भी रोक लगा दी थी। चंद्रबाबू नायडू की सरकार ने राज्य में सीबीआई को जांच के लिए दी गई शक्तियां वापस ले लीं। छत्तीसगढ़ में भी जनवरी, 2019 में सीबीआई को सरकार की अनुमति के बिना जांच करने से रोका जा चुका है। एेसा करने वाला यह देश का तीसरा राज्य है।
क्या है विवाद की मुख्य वजह?
इस विवाद की मुख्य वजह है देश के सबसे बड़े आर्थिक घोटालों में से एक शारदा चिटफंड घोटाला। लोगों को अधिक रिटर्न देने के बहाने सारदा समूह ने साल 2000 की शुरुआत से अप्रैल 2013 तक 17 लाख जमाकर्ताओं से 2500 करोड़ रुपये जुटा लिए थे। साल 2009 में पता चला कि समूह सेबी और कंपनी कानूनों का उल्लंघन कर रहा है। इस समूह में 239 कंपनियां शामिल हैं। छवि ठीक रहे इसके लिए ग्रुप ने कोलकाता के फुटबाॅल क्लब मोहन बागान और ईस्ट बंगाल में निवेश तक किया था।
इसके बाद साल 2013 में इस बात का पता चला कि समूह नए निवेशकों से पैसा लेकर पुराने निवेशकों का भुगतान कर रहा है। जबकि निवेश से होने वाली आय से भुगतान नहीं किया जा रहा है। अप्रैल माह तक ये स्कीम पूरी तरह बर्बाद हो गई। न केवल पश्चिम बंगाल बल्कि असम, ओडिशा और त्रिपुरा के लोगों का भी पैसा डूब गया। उसी साल शारदा समूह के एमडी सुदिप्ता सेन तथा अन्य अधिकारियों को कश्मीर से गिरफ्तार किया गया। इसी दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मामले की जांच के लिए विशेष जांच टीम का गठन कर दिया। इसके साथ ही सरकार ने छोटे निवेशकों के लिए 500 करोड़ रुपये का रिलीफ फंड भी जारी किया।
इसके बाद साल 2013 में इस बात का पता चला कि समूह नए निवेशकों से पैसा लेकर पुराने निवेशकों का भुगतान कर रहा है। जबकि निवेश से होने वाली आय से भुगतान नहीं किया जा रहा है। अप्रैल माह तक ये स्कीम पूरी तरह बर्बाद हो गई। न केवल पश्चिम बंगाल बल्कि असम, ओडिशा और त्रिपुरा के लोगों का भी पैसा डूब गया। उसी साल शारदा समूह के एमडी सुदिप्ता सेन तथा अन्य अधिकारियों को कश्मीर से गिरफ्तार किया गया। इसी दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मामले की जांच के लिए विशेष जांच टीम का गठन कर दिया। इसके साथ ही सरकार ने छोटे निवेशकों के लिए 500 करोड़ रुपये का रिलीफ फंड भी जारी किया।
तृणमूल पार्टी का नाम क्यों आ रहा है सामने?
इस मामले में ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस का नाम इसलिए सामने आ रहा है क्योंकि उनपर आरोप लगता रहा है कि चिटफंड ग्रुप के चेयरमैन सुदिप्ता सेन उनके करीबी हैं। केवल इतना ही नहीं उस वक्त तृणमूल के सासंद रहे कुणाल घोष को भी मीडिया समूह का सीईओ नियुक्त किया गया था। इस मीडिया ग्रुप में शारदा ने 988 करोड़ रुपये का निवेश किया था। घोष की सैलरी भी काफी अधिक थी। उन्हें हर महीने 16 लाख रुपये की सैलरी दी जाती थी।
इसके साथ ही पार्टी के एक और सासंद सृंजॉय बोस भी कंपनी के मीडिया से जुड़े कामकाज में शामिल थे। कंपनी के कर्मचारी संघ के प्रधान प्रमुख भी उस वक्त के परिवहन मंत्री मदान मित्रा थे। सीबीआई ने पार्टी के लोगों सृंजॉय बोस, मदान मित्रा तथा कुणाल घोष को गिरफ्तार भी किया था।
इसके साथ ही पार्टी के एक और सासंद सृंजॉय बोस भी कंपनी के मीडिया से जुड़े कामकाज में शामिल थे। कंपनी के कर्मचारी संघ के प्रधान प्रमुख भी उस वक्त के परिवहन मंत्री मदान मित्रा थे। सीबीआई ने पार्टी के लोगों सृंजॉय बोस, मदान मित्रा तथा कुणाल घोष को गिरफ्तार भी किया था।
दूसरी पार्टी के नेता भी जुड़े कंपनी से?
कांग्रेस और भाजपा के नेताओं पर भी कंपनी से जुड़े रहने के आरोप लग चुके हैं। आरोपों में कहा गया कि कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री मतंग सिंह तथा असम के भाजपा नेता हेमंत बिस्वसरमा (जो पहले कांग्रेस में थे) से कंपनी के संबंध रह चुके हैं। इस मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने साल 2015 में बिस्वसरमा की पत्नी से पूछताछ की थी। सारदा समूह ने बिस्वसरमा की पत्नी रिंकी को विज्ञापन के लिए पैसे दिए थे। इसके अलावा इस मामले में ममता के करीबी रहे मुकुल रॉय (जो अब भाजपा में हैं) से भी पूछताछ हो चुकी है।

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