भारतीय अवधारणा के अनुरूप हो पर्यावरण पाठ्यक्रम -अतुल कोठारी
- जनेकृविवि में पर्यावरण विज्ञान पाठ्यक्रम पर राष्ट्रीय संगोष्ठी संपंन
- राष्ट्रीय विद्वानों ने संस्कारधानी को पर्यावरण विज्ञान पाठ्यक्रम सुधार हेतु उपयुक्त माना
जबलपुर, 22 जून। व्यवहारिक और सैद्धांतिक षिक्षा व्यवस्था के बिना पर्यावरण ठीक नहीं हो सकता। हमारा पाठ्यक्रम व्यवहारिक नहीं है। इसमें भारतीय अवधारणा को जोड़ कर सुधार की आवष्यकता है। पर्यावरण का संकट महज 60 साल पुराना है, जबकि हमारे ग्रंथों में 27 सौ साल पहले ही पर्यावरण संरक्षण का निदान दे दिया गया, तदापि उस वक्त पर्यावरण दुरूस्त था, यानि संकट आने से पहले ही उसका निदान ढूंढ़ लिया गया। यही हमारी भारतीय अवधारणा है। हमारी परम्परागत रसोई पूर्ण चिकित्सालय है। ऐसी दृष्टि पुनः विकसित करने की जरूरत है। तदाषय के सारगर्भित और प्रेरणास्पद् उद्गार महासचिव राष्ट्रीय षिक्षण संस्कृति उत्थान व्यास नईदिल्ली श्री अतुल कोठारी ने जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय में आयोजित पर्यावरण विज्ञान पाठ्यक्रम परिचर्चा में बतौर मुख्य अतिथि व्यक्त किये। श्री कोठारी ने आगे कहा कि पाठ्यक्रम में भारतीय धर्मग्रंथों के ज्ञान का समावेष करना कोई साम्प्रदयिकता की बात नहीं है क्योंकि पर्यावरण से दुनिया के हर एक व्यक्ति, पषु-पक्षी और वनस्पति का गहरा नाता है।
पूर्व में प्रस्तवना उद्बोधन में राष्ट्रीय समन्वयक पर्यावरण षिक्षा एवं सदस्य ए.आई.सी.टी.ई. नई दिल्ली डॉं. सदाचारी सिंह तोमर ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेष के परिपालन में 2003 में देषभर में पर्यावरण पाठ्यक्रम कक्षा 1 से पी.एच.डी. तक आरंभ किया गया, जिसमें अनेक त्रृटियां रह गईं। इसे सुधारने के लिये संस्कारधानी जबलपुर से अच्छा दूसरी कोई स्थान नहीं हो सकता क्योंकि यहां आर्युविज्ञान, कृषि, वेटनरी, अभियांत्रिकी और समस्त पाठ्यक्रमों के विष्वविद्यालय और विषेषज्ञ एक साथ मौजूद हैं। जिनका सहयोग लेकर पर्यावरण पाठ्यक्रम में आवष्यक सुधारकर देषभर के पाठ्यक्रम में लागू किया जायेगा। इसलिये यह अत्यन्त ही संजीदा और महत्वपूर्ण संगोष्ठी है।
अपने अध्यक्षीय उदबोधन में जनेकृविवि के कुलपति डॉं. प्रदीप कुमार बिसेन ने कहा किसी भी संकट का हल खोजना और समाधान पेष करना हम बुद्धिजीवियों का अहम् दायित्व है। खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने की होड़ में कृषि के क्षेत्र में पर्यावरण का सर्वाधित नुकसान हुआ है। रासायनिक खादों से जल, वायु, मिट्टी और यहां तक की माता का दूध तक दूषित हुआ है। इसलिये जैविक खेती को अपनाकर पर्यावरण सुधारा जा सकता है। उन्होंने जनेकृविवि को पर्यावरण के अनुकूल बनाने का संकल्प लिया। रादुविवि के कुलपति डॉं. कपिलदेव मिश्र ने कहा हमारा समग्र पाठ्यक्रम ही पर्यावरण सम्मत होना चाहिए। पन्नी को नष्ट करने हेतु हमें विकल्प देना होगा। जबकि नादेपचिविवि के कुलपति डॉं. पी.डी. जुयाल ने नैसर्गिक पर्यावरण के संरक्षण हेतु जन जागरूकता की महत्ती आवष्यकता प्रतिपादित की। अधिष्ठाता कृषि संकाय डॉ. पी.के. मिश्रा, संचालक अनुसंधान सेवायें एवं संचालक शिक्षण डॉ. धीरेन्द्र खरे, संचालक विस्तार सेवायें डॉ. (श्रीमति) ओम गुप्ता, संचालक प्रक्षेत्र डॉ. शरद तिवारी, अधिष्ठाता कृषि महाविद्यालय डॉं. आर.एम. साहू ने भी पर्यावरण पाठ्यक्रम हेतु आवष्यक सुझाव दिये।
इस मौके पर जनेकृविवि, रादुविवि, नादेपचिविवि, आर्युविज्ञान विवि एवं इंजीनियरिंग कालेज के विषय वस्तु विषेषज्ञों एवं छात्रों ने अपने-अपने पाठ्यक्रमों में शामिल पर्यावरण संबंधी महत्वपूर्ण जानकारियां पेष कीं। संगोष्ठी में समस्त विष्वविद्यालयों के विषेषज्ञ एवं छात्रगण शामिल थे। संगोष्ठी का मुख्य उद्देष्य वर्तमान पर्यावरण पाठ्यक्रम में भारतीय अवधारणा के अनुरूप आवष्यक सुधारकर इसे देषभर के समग्र पाठ्यक्रमों में शामिल करना है। इस हेतु देषभर में राष्ट्रीय संगोष्ठियां और बैठकों का आयोजन लगातार किया जायेगा। कार्यक्रम समन्वयक एवं विभागाध्यक्ष डॉं. एस.डी. उपाध्याय ने कार्यक्रम का संचालन एवं आभार प्रदर्षन संचालक अनुसंधान सेवायें एवं संचालक शिक्षण डॉ. धीरेन्द्र खरे ने किया। आयोजन की सफलता में तकनीकी प्रषासनिक अधिकारी डॉं. अनय रावत, सुरक्षा अधिकारी डॉं. वाय.एम. शर्मा, डॉं. कुन्दन सिंह, डॉं. अतुल सिंह, डॉं. अलोक तिवारी और डॉं. प्रमोद गुप्ता आदि का सराहनीय योगदान रहा।
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