नगर निगम : हमारे टैक्स की रकम से जमा होता है निगम अफसरों का 5 लाख का मोबाइल बिल; और ये हैं कि फोन नहीं उठाते
भोपाल. हर माह नगर निगम के अफसरों का मोबाइल बिल करीब 5 लाख रुपए आता है। यह राशि हमारे द्वारा दिए गए टैक्स से जमा होती है। लेकिन काम करना तो दूर ये अफसर फोन तक नहीं उठाते। यह हकीकत है। नगर निगम की कार्यप्रणाली की। अमूमन हर निगम परिषद बैठक में इस मुद्दे पर हंगामा होता है। गर्मी के मौसम में जलसंकट की स्थिति में तत्कालीन निगमायुक्त प्रियंका दास ने जलकार्य विभाग के इंजीनियरों के फोन आम जनता के लिए सार्वजनिक किए थे। लेकिन जब यह इंजीनियर पार्षदों के फोन नहीं उठाते तो आम जनता के फोन को लेकर ऐसी उम्मीद करना ही व्यर्थ है।
दरअसल, वार्ड 20 के भाजपा पार्षद जोन अध्यक्ष संजीव गुप्ता इस समस्या से सबसे ज्यादा पीड़ित हैं। वे पूरे गर्मी के मौसम में अपने जोन के सहायक यंत्री राकेश द्विवेदी से परेशान रहे। पिछली परिषद बैठक में भाजपा पार्षद रवींद्र यती और एमआईसी सदस्य दिनेश यादव ने सिटी प्लानर विजय सावलकर पर भी फोन नहीं उठाने का आरोप लगाया था। इसके बाद सावलकर की निगम से विदाई का प्रस्ताव पारित हुआ था। दक्षिण- पश्चिम विधानसभा की एक महिला पार्षद भी हर स्तर पर यह शिकायत कर चुकी हैं, लेकिन पार्टी के अनुशासन के कारण वे इस बारे में सार्वजनिक रूप से चर्चा नहीं करतीं। निगम में छोटे-छोटे काम भी महीनों तक लंबित रहते हैं।
पार्षद बोले- काटते रहते हैं चक्कर, ऐसा न करें तो काम ही न हो : अफसरों की इस कार्यप्रणाली के कारण निगम में छोटे-छोटे काम भी महीनों तक लंबित रहते हैं। परिषद बैठक में पारित होने वाले प्रस्तावों पर भी दो से चार महीने तक कार्रवाई नहीं होती। समय पर टेंडर तक ओपन नहीं होते और टेंडर ओपन हो जाएं तो वर्क ऑर्डर जारी नहीं होते। कई पार्षद निगम में फाइलें लेकर एक टेबल से दूसरी टेबल पर चक्कर काटते रहते हैं। पार्षद कहते हैं कि यदि वे ऐसा नहीं करें तो काम ही ना हों।
अपर आयुक्तों को वित्तीय अधिकार देना भूल गया था निगम प्रशासन :नगर निगम की कार्यप्रणाली का इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि निगम प्रशासन नए अपर आयुक्तों को वित्तीय अधिकार देना भूल गया था। जब इन अफसरों के पास भुगतान की फाइलें लंबित हुईं तब इसका खुलासा हुआ। इसके बाद निगम प्रशासन सक्रिय हुअा। और शक्ति आदेश जारी हुए। इसके बाद फाइलें क्लीयर हुई लेकिन इस बीच अपर आयुक्त(वित्त ) बदल गए और भुगतान अब भी अटके हुए हैं।
हिदायत देंगे कम से कम जनप्रतिनिधियों के फोन तो उठाएं : महापौर आलोक शर्मा ने कहा कि अधिकारियों को जनप्रतिनिधि के फोन तो उठाना ही पड़ेंगे। मैं कई बार अफसरों को निर्देश दे चुका है। कमिश्नर अविनाश लवानिया का कहना है कि कई बार कामकाज और मीटिंग में व्यस्त रहने के कारण ऐसी स्थिति बनती है।
दरअसल, वार्ड 20 के भाजपा पार्षद जोन अध्यक्ष संजीव गुप्ता इस समस्या से सबसे ज्यादा पीड़ित हैं। वे पूरे गर्मी के मौसम में अपने जोन के सहायक यंत्री राकेश द्विवेदी से परेशान रहे। पिछली परिषद बैठक में भाजपा पार्षद रवींद्र यती और एमआईसी सदस्य दिनेश यादव ने सिटी प्लानर विजय सावलकर पर भी फोन नहीं उठाने का आरोप लगाया था। इसके बाद सावलकर की निगम से विदाई का प्रस्ताव पारित हुआ था। दक्षिण- पश्चिम विधानसभा की एक महिला पार्षद भी हर स्तर पर यह शिकायत कर चुकी हैं, लेकिन पार्टी के अनुशासन के कारण वे इस बारे में सार्वजनिक रूप से चर्चा नहीं करतीं। निगम में छोटे-छोटे काम भी महीनों तक लंबित रहते हैं।
पार्षद बोले- काटते रहते हैं चक्कर, ऐसा न करें तो काम ही न हो : अफसरों की इस कार्यप्रणाली के कारण निगम में छोटे-छोटे काम भी महीनों तक लंबित रहते हैं। परिषद बैठक में पारित होने वाले प्रस्तावों पर भी दो से चार महीने तक कार्रवाई नहीं होती। समय पर टेंडर तक ओपन नहीं होते और टेंडर ओपन हो जाएं तो वर्क ऑर्डर जारी नहीं होते। कई पार्षद निगम में फाइलें लेकर एक टेबल से दूसरी टेबल पर चक्कर काटते रहते हैं। पार्षद कहते हैं कि यदि वे ऐसा नहीं करें तो काम ही ना हों।
अपर आयुक्तों को वित्तीय अधिकार देना भूल गया था निगम प्रशासन :नगर निगम की कार्यप्रणाली का इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि निगम प्रशासन नए अपर आयुक्तों को वित्तीय अधिकार देना भूल गया था। जब इन अफसरों के पास भुगतान की फाइलें लंबित हुईं तब इसका खुलासा हुआ। इसके बाद निगम प्रशासन सक्रिय हुअा। और शक्ति आदेश जारी हुए। इसके बाद फाइलें क्लीयर हुई लेकिन इस बीच अपर आयुक्त(वित्त ) बदल गए और भुगतान अब भी अटके हुए हैं।
हिदायत देंगे कम से कम जनप्रतिनिधियों के फोन तो उठाएं : महापौर आलोक शर्मा ने कहा कि अधिकारियों को जनप्रतिनिधि के फोन तो उठाना ही पड़ेंगे। मैं कई बार अफसरों को निर्देश दे चुका है। कमिश्नर अविनाश लवानिया का कहना है कि कई बार कामकाज और मीटिंग में व्यस्त रहने के कारण ऐसी स्थिति बनती है।

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