भाजपा-कांग्रेस का उन 44 सीटों पर जोर, जो 5 हजार से कम वोटों से हारीं
भोपाल.मध्यप्रदेश विधानसभा की 230 सीटों पर साल के अंत में होने वाले चुनावों के लिए प्रदेश के दोनों ही प्रमुख दल रणनीति बनाने में जुट गए हैं। एक-एक सीट पर हर संभव समीकरणों को जोड़ा जा रहा है। दोनों ही दलों का सबसे ज्यादा फोकस कम अंतर से हारी सीटों पर है।
साल के अंत में 15वीं विधानसभा के लिए वोटिंग होना है। सत्ता पर काबिज होने के लिए भाजपा-कांग्रेस पूरी ताकत से चुनावी रण में उतर चुकी हैं। दोनों ही पार्टियों के चुनावी वार रूम में हार-जीत के समीकरणों पर मंथन चल रहा है। दोनों दलों के रणनीतिकार प्रदेश की उन 44 सीटों पर फोकस किए हुए हैं, जिन पर मुकाबला काफी नजदीकी था। 5 हजार से भी कम वोटों के फेर में भाजपा-कांग्रेस ने 22-22 सीटे गंवाई थीं। चार सीटें त्रकोणीय मुकाबले में दूसरे दलों और निर्दलियों के खाते में चली गईं।
भाजपा : एंटी इनकंबेंसी की चुनौती:भाजपा के सामने बड़ी चुनौती 15 साल से सत्ता में होने से एंटी इनकंबेंसी की रहेगी। इसलिए पिछले चुनाव के फायदे और कमजोर सीटों की रिपोर्ट तैयार की जा रही है। 2013 के चुनाव में 19 सीट भाजपा 5 हजार से कम फासले पर हार गई थी, जबकि इतने ही कम वोटों से 3 सीटों पर हुए उपचुनाव में भाजपा हारी है। प्रदेश संगठन ऐसी कमजोर सीटों पर एक्शन प्लान तैयार कर रहा है।
कांग्रेस : 14 सीटें, जो तीन से पांच हजार वोटों के नजदीकी मुकाबले मेंगंवाईं:तीन उपचुनाव लगातार जीतने और मंगलवार को नगरीय निकाय उपचुनाव में 14 में से 9 सीट पाने के बाद कांग्रेस उत्साहित है। पार्टी इस बार अलग-अलग क्षेत्रों के हिसाब से चुनावी रणनीति बना रही है। ऐसी सीटों के लिए खास प्लानिंग की जा रही है, जो बेहद नजदीकी मुकाबले में पार्टी ने गंवाई थीं। ऐसी 14 सीटें हैं जो कांग्रेस ने महज 3 से 5 हजार वोटों के नजदीकी मुकाबले में गंवाई हैं।
रणनीति पर काम कर रहे हैं: कुछ विधानसभा क्षेत्रों को छोड़ भाजपा का वोट प्रतिशत हर चुनाव में लगातार बढ़ा है। कम मार्जिन वाली सीटों पर अलग रणनीति पर काम हो रहा है। इस बार 200 पार के लक्ष्य के लिए पार्टी निश्चिंत है। - राहुल कोठारी, प्रदेश प्रवक्ता, भाजपा
इस बार कांग्रेस जीतेगी: पिछले चुनाव में बेहद कम अंतर से हारने वाली सीटों पर विशेष फोकस है, जिन्हें इस बार जरूर जीतेंगे। भाजपा का गढ़ मानी जाने वाली सीटों पर भी जनता का आशीर्वाद कांग्रेस को ही मिलेगा।
साल के अंत में 15वीं विधानसभा के लिए वोटिंग होना है। सत्ता पर काबिज होने के लिए भाजपा-कांग्रेस पूरी ताकत से चुनावी रण में उतर चुकी हैं। दोनों ही पार्टियों के चुनावी वार रूम में हार-जीत के समीकरणों पर मंथन चल रहा है। दोनों दलों के रणनीतिकार प्रदेश की उन 44 सीटों पर फोकस किए हुए हैं, जिन पर मुकाबला काफी नजदीकी था। 5 हजार से भी कम वोटों के फेर में भाजपा-कांग्रेस ने 22-22 सीटे गंवाई थीं। चार सीटें त्रकोणीय मुकाबले में दूसरे दलों और निर्दलियों के खाते में चली गईं।
भाजपा : एंटी इनकंबेंसी की चुनौती:भाजपा के सामने बड़ी चुनौती 15 साल से सत्ता में होने से एंटी इनकंबेंसी की रहेगी। इसलिए पिछले चुनाव के फायदे और कमजोर सीटों की रिपोर्ट तैयार की जा रही है। 2013 के चुनाव में 19 सीट भाजपा 5 हजार से कम फासले पर हार गई थी, जबकि इतने ही कम वोटों से 3 सीटों पर हुए उपचुनाव में भाजपा हारी है। प्रदेश संगठन ऐसी कमजोर सीटों पर एक्शन प्लान तैयार कर रहा है।
कांग्रेस : 14 सीटें, जो तीन से पांच हजार वोटों के नजदीकी मुकाबले मेंगंवाईं:तीन उपचुनाव लगातार जीतने और मंगलवार को नगरीय निकाय उपचुनाव में 14 में से 9 सीट पाने के बाद कांग्रेस उत्साहित है। पार्टी इस बार अलग-अलग क्षेत्रों के हिसाब से चुनावी रणनीति बना रही है। ऐसी सीटों के लिए खास प्लानिंग की जा रही है, जो बेहद नजदीकी मुकाबले में पार्टी ने गंवाई थीं। ऐसी 14 सीटें हैं जो कांग्रेस ने महज 3 से 5 हजार वोटों के नजदीकी मुकाबले में गंवाई हैं।
रणनीति पर काम कर रहे हैं: कुछ विधानसभा क्षेत्रों को छोड़ भाजपा का वोट प्रतिशत हर चुनाव में लगातार बढ़ा है। कम मार्जिन वाली सीटों पर अलग रणनीति पर काम हो रहा है। इस बार 200 पार के लक्ष्य के लिए पार्टी निश्चिंत है। - राहुल कोठारी, प्रदेश प्रवक्ता, भाजपा
इस बार कांग्रेस जीतेगी: पिछले चुनाव में बेहद कम अंतर से हारने वाली सीटों पर विशेष फोकस है, जिन्हें इस बार जरूर जीतेंगे। भाजपा का गढ़ मानी जाने वाली सीटों पर भी जनता का आशीर्वाद कांग्रेस को ही मिलेगा।

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