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उम्मीद पर पानी फेरकर विदा हुआ मानसून, रवि की फसल कैसे सीचेंगे?

draught in madhya pradesh

दीपक राय, भोपाल ...

रविवार को दक्षिण पश्चिम मानसून प्रदेश से विदा हो गया। इस बार मानसून ने लोगों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। इस साल मानसून बहुत ही कमजोर रहा। इस मानसूनी सीजन में पूरे प्रदेश में औसत रूप से 170 मिमी कम बारिश दर्ज की गई। 1 जून से 25 सितंबर तक के मानसूनी सीजन में  923.0 मिमी बारिश होनी चाहिए थी, लेकिन 754.2 मिमी पानी ही बरसा। अनियमित बारिश और अल्पवर्षा के कारण अधिकांश जिलों में सोयाबीन, धान, मक्का की फसलें चौपट हो गईं। इस बार मानसून ने प्रदेश में 22 जून को दस्तक दी थी। 2 जुलाई को मानसून पूरे प्रदेश में सक्रिय हो गया था।



  • 20 प्रतिशत कम बारिश से बढ़ सकता है संकट, रवि की फसलों पर संकट
  •  नहीं हुई झमाझम बारिश, अल्पवर्षा से लोग उदास
  • 13 जिलों में सूखा घोषित, 3-4 जिले और सूखाग्रस्त होंगे घोषित
  • 12 तहसीलें अन्य जिलों की भी सूखाग्रस्त
  • 29 जिलों में सामान्य से कम बारिश हुई
  • 22 जिलों में सामान्य बारिश हुई
  • 20 लाख टन कम होगी चावल की ऊपज
  •  8 लाख टन हो सकता है दाल का उत्पादन



यहां सामान्य बारिश
कटनी, छिंदवाड़ा, सिवनी, रीवा, सिंगरौली, इंदौर, धार, झाबुआ, खरगोन, बड़वानी, खण्डवा, बुरहानपुर, उज्जैन, मंदसौर, नीमच, रतलाम, देवास, आगर-मालवा, गुना, अशोकनगर, सीहोर और राजगढ़

यहां कम बारिश 
जबलपुर, बालाघाट, मण्डला, डिण्डोरी, नरसिंहपुर, सागर, दमोह, पन्ना, टीकमगढ़, छतरपुर, सीधी, सतना, शहडोल, अनूपपुर, उमरिया, अलीराजपुर, शाजापुर, मुरैना, श्योपुर, भिण्ड, ग्वालियर, शिवपुरी, दतिया, रायसेन, विदिशा, होशंगाबाद, हरदा, भोपाल और बैतूल

इन्हें सूखाग्रस्त किया घोषित
अशोकनगर, भिंड, छतरपुर, दमोह, ग्वालियर, इंदौर, पन्ना, सागर, सतना, शिवपुरी, सीधी, टीकमगढ़, विदिशा।

ये जिले भी हो सकते हैं घोषित 
श्योपुर, मुरैना, दतिया और नीमच

ये 12 तहसीलें भी सूखे के दायरे में
दतिया, मल्हारगढ़, मंदसौर, मनासा, नीमच, बोहरी, जयसिंहनगर, विजयपुर, कराहज, बीरपुर, मानपुर और जीरन


कल फिर बैठक लेंगे मुख्य सचिव
17 अक्टूबर को मुख्य सचिव बसंत प्रताप सिंह की अध्यक्षता में फिर से राज्य स्तरीय सूखा निगरानी समिति की बैठक होगी।

किसानों की जी का जंजाल बने यह नियम
राजस्व और कृषि विभाग के अधिकारियों ने बताया कि केंद्र सरकार ने जिले या तहसील को सूखाग्रस्त घोषित करने के नए पैमाने बनाए हैं। इसमें बारिश की स्थिति, बारिश में अंतराल, भू-जलस्तर की स्थिति, तापमान में नमी और बोवनी के रकबे को देखा जाता है।

केंद्र में उलझी सूखा नीति
शिवराज के लिए यह चुनौती
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के लिए 13 साल के कार्यकाल में यह सबसे कठिन दौर जब वह सूखे की मार झोल रहे किसानों को राहत देने में असर्मथ हैं। केंद्र की सूख घोषित नीतियों में बदलाव के बाद से ही सीएम शिवराज ने अभी तक कोई भी घोषणा नहीं की है। बीते साल उन्होंने किसानों को खुश करने कई तरह की घोषणाएं की थी। लेकिन केंद्र ने बड़े बदलाव करते हुए दिसंबर में एक नया नियम लागू किया था। अब उसी क्षेत्र को सूखा घोषित किया जा सकता है जिसकी जांच पड़ताल की गई हो।

ग्वालियर संभाग में भयावह स्थिति
ग्वालियर संभाग ही 50 प्रतिशत तक सूखा है। प्रदेश के शिवपुरी जिले में स्थिति और भी ज्यादा भयावह है। यहां 51 प्रतिशत बारिश औसत से कम हुई है।

खरीफ फसलों के उत्पादन में होगी कमी
इस साल देश के कुछ इलाकों में सूखे की स्थिति के चलते चावल और दाल के उत्पादन में कमी आ सकती है। केंद्रीय कृषि मंत्रालय 2017-18 में खरीफ फसलों के उत्पादन का पहला संभावित आंकड़ा जारी किया है। चावल और दाल जैसे खरीफ फसलों के उत्पादन में करीब 38.6 लाख टन कमी आने की आशंका है। 2016 -17 में खरीफ फसलों का उत्पादन करीब 13.85 करोड़ टन हुआ था जो देश में आजतक का रिकॉर्ड उत्पादन था।

दालों का उत्पादन घटेगा
सरकार को असली झटका दाल, खासकर अरहर दाल के उत्पादन में लग सकता है। 2016-17 में जहां अरहर दाल का वास्तविक उत्पादन रिकॉर्ड 47.8 लाख टन था वहीं 2017-18 में अरहर का उत्पादन करीब 40 लाख टन ही रहने की आशंका है। सरकार ने लक्ष्य 42.5 लाख टन उत्पादन का रखा था।


सोयाबीन का रकबा घटा
मध्य प्रदेश में सोयाबीन के रकबे में कमी दर्ज की गई है। यह पिछले पांच साल के औसत 58 लाख हेक्टेयर से कम होकर 2017 के खरीफ (ग्रीष्म) सत्र में  50 लाख टन रह गया है। दूसरी तरफ इसी दौरान उड़द दाल का रकबा बढ़कर 18 लाख हेक्टेयर हो गया है। उड़द का  औसत रकबा राज्य में 8.5 लाख हेक्टेयर रहा है।


विशेषज्ञों की राय
मप्र में सोयाबीन को नुकसान
सोयाबीन प्रोसेसर्स ऐसोसिएशन ऑफ इंडिया की 2017 की खरीफ सत्र की रिपोर्ट में कहा गया है, मध्य प्रदेश और महाराष्टï्र के कुछ हिस्सों में नमी की कमी के कारण सोयाबीन फसल को बहुत नुकसान हुआ है।

बुआई पर बुरा असर
भारतीय दलहन शोध संस्थान (आईआईपीआर) में परियोजना संयोजक संजीव गुप्ता कहते हैं, शुरुआत में बारिश अधिक नहीं होने से सोयाबीन या अरहर की स्वाभाविक बुआई पर असर पड़ा, जिससे मध्य प्रदेश के किसानों के पास उड़द एक मात्र विकल्प रह गया था।

लगातार घटे बारिश के दिन
वर्ष औसत वर्षा के दिन
1951-80 44.3
1990-99 43.8
2000-09 40.6

कब-कब कितनी बारिश (जून से सितंबर, औसत मानसून)
2012 877.8 मिमी
2013 841.7 मिमी
2014 635.8 मिमी
2015 572.8 मिमी
2016 496.4 मिमी

आधे बांध तो सिर्फ एक बार सिंचाई का पानी ही दे सकते हैं
मध्य प्रदेश के बांध औसत रूप से 54 फीसदी ही भरे हैं। आधे बांध तो सिर्फ एक बार सिंचाई का पानी ही दे सकते हैं। पिछले वर्ष रबी सीजन में 26.51 लाख हेक्टयर भूमि की सिंचाई कराई थी। बांध लबालब भरे थे, इसलिए मांग के अनुसार पानी छोड़ा गया था, लेकिन इस बार बांधों का औसतन जल स्तर आधा है। पिछले साल सभी बांध औसतन 98 फीसदी भरे थे। इस बार राज्य में 19 बड़े, 85 मध्यम एवं 4800 छोटे बांधों का औसतन भराव 54 फीसदी है। सिंचाई के साथ-साथ सरकार को चिंता पेयजल आपूर्ति पर है।

बांध में जल भराव (4 अक्टूबर 2017 की स्थिति)
बांध क्षमता भराव प्रतिशत पिछले साल भराव
बरगी 422.760 421.200 87 99
तवा 355.400 352.250 71 100
बाण सागर 341.640 338.790 71 99
गांधी सागर 400.000 396.660 71 99
इंदिरा सागर 262.130 253.960 38 99.50
बारना 348.550 345.490 57 99
कोलार 462.200 454.810 55 99
पेंच बांध 625.750 624.990 91 41

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