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भर्ती घोटाले में साथ न देने की मिल रही सजा

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हाई कोर्ट के बाहर धरना दे रहे एडीजे बोले
जबलपुर,। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी तथा अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश आरके श्रीवास का सत्याग्रह जारी है। गुरुवार को दूसरे दिन सत्याग्रह का आखिरी दिन था। श्रीवास ने साफ-साफ चेतावनी दी है कि यदि इसके बाद भी इंसाफ नहीं मिला तो वे भूख हड़ताल को मजबूर होंगेे। इस बीच उन्होंने सत्याग्रह स्थल पर बड़ा खुलासा करते हुए आरोप लगाया कि कोर्ट में चौथे स्तर की भर्ती में घोटाला हुआ है। इस घोटाले में साथ नहीं देने के कारण ही उन्हें महज 15 माह में चौथे तबादले जैसी कठोर सजा दी गई है। एडीजे श्रीवास ने बाकायदे दस्तावेजों का अवलोकन करवाते हुए साफ किया कि नवंबर-2016 में न्यायालयीय स्तर पर चतुर्थ श्रेणी कर्मियों की भर्ती प्रक्रिया आयोजित की गई। इसके लिए गठित बोर्ड में उन्हें एक सदस्य बनाया गया। जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने उन्हें हिदायत दी थी कि जो भी आवेदक साक्षात्कार देने आएं, उनमें से किसी को 6 से अधिक अंक मत देना। ऐसा इसलिए क्योंकि जिनकी नियुक्ति करनी है, वो हम अपने स्तर पर कर देंगे। चूंकि इस हिदायत के बावजूद बोर्ड सदस्य होने के नाते मैंने ईमानदारी से कुछ आवेदकों को उनकी पात्रता के अनुरूप यथोचित अंक दे दिए, इसीलिए उनके प्रति दुर्भावना बरती जाने लगी। यदि मेरे द्वारा लगाए गए सभी आरोपों की उच्चस्तरीय जांच करवाई जाए, तो स्वत: दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।

2014 से शुरू हुई प्रताडऩा
एडीजे श्रीवास ने बताया कि 2014 में जब वे धार में पदस्थ थे, तब एक गोपनीय शिकायत के आधार पर उनके खिलाफ जांच शुरू कर दी गई थी। सवाल उठता है कि जब वह शिकायत बाकायदे शपथपत्र पर नहीं की गई थी, तो उस पर भरोसा करते हुए जांच क्यों शुरू की गई। चूंकि यह रवैया सुप्रीम कोर्ट के 3 अक्टूबर 2014 के अलावा 20 नवंबर 2014 के अन्य न्यायिक परिपत्र का उल्लंघन करते हुए अपनाया गया, अत: इंसाफ अपेक्षित है। इन परिपत्रों में व्यवस्था दी गई है कि किसी भी न्यायिक अधिकारी के खिलाफ जब तक शपथपत्र पर शिकायत न प्रस्तुत की जाए, उसे जांच में न लिया जाए। इसके बावजूद ऐसा किया गया। एडीजे श्रीवास ने सवाल उठाया कि क्या सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश के विपरीत बिना शपथपत्र वाली शिकायत के आधार पर संज्ञान लेकर उनके खिलाफ 2014 से शुरू की गई जांच उचित है क्या ऐसी शिकायतों के आधार पर जारी नोटिस का जवाब उनके लिए बंधनकारी है इस संबंध में पहले पत्र और उसके बाद रिमाइंडर पर रिमाइंडर देने के 18 माह बाद नोटशीट खोली गई और नतीजे बतौर मुझे बिना सुने एकपक्षीय तरीके से चेतावनी देकर फाइल बंद कर दी गई। क्या यही इंसाफ है। एडीजे श्रीवास ने बताया कि 2016 में जब न्यायिक अधिकारियों के थोक तबादले हाईकोर्ट की ट्रांसफर नीति के विपरीत हुए, तो मैंने एक जागरुक एडीजे के नाते उसका विरोध किया। इसके तहत सर्वप्रथम तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश को पत्र सौंपा, जिसकी प्रतिलिपि तत्कालीन रजिस्ट्रार जनरल को भी भेजी गई। जब कोई नतीजा नहीं निकला तो मीडिया और सोशल मीडिया का सहारा लेना पड़ा। इससे एक अच्छी बात यह हुई कि अंतत: हाईकोर्ट को अनुचित तबादले रोकने पड़े और ट्रांसफर के कुछ प्रावधान संशोधित व स्पष्ट हुए। एडीजे श्रीवास ने दर्द बयां करते हुए बताया कि हाईकोर्ट की ट्रांसफर पॉलिसी के विपरीत हुए तबादले का विरोध करने का खामियाजा यह भुगतना पड़ा कि मुझे दंड बतौर काफी कम समय में शहडोल से सिहोरा ट्रांसफर कर दिया गया। वहां मुझे कोई सुविधा नहीं दी गई। इस प्रताडऩा के खिलाफ मुख्य न्यायाधीश से शिकायत की गई। जब कोई हल नहीं निकला तो फिर से शिकायत की गई। इसके बाद मुझे प्रताडि़त करते हुए काफी कम समय में सिहोरा से जबलपुर ट्रांसफर कर दिया गया। एडीजे श्रीवास ने आरोप लगाया कि 21 फरवरी 2017 को डीजे केके त्रिपाठी ने मुझे मेरी समस्या सुनने की आड़ में अपने चेम्बर में बुलाया। इस दौरान गुप्त रूप से मेरी रिकॉर्डिंग की गई। इसके बाद 31 मार्च 2017 को तत्कालीन रजिस्ट्रार जनरल मनोहर ममतानी ने मुझे शोकॉज नोटिस जारी कर दिया। जिसमें कहा गया कि क्यों न अनुशासनहीनता के एवज में मेरे खिलाफ विभागीय जांच शुरू की जाए मैंने इसका अपने स्तर पर संतोषजनक जवाब प्रस्तुत कर दिया। लिहाजा, डीई टल गई।

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